इस रात की सुबह नहीं

रोक सको तो रोक लो उस आँसुओं की धार को,
जो बहे इस देश के सम्मान की अर्थी को उठता देख कर ।

चुन सको तो चुन लो इस माटी के उस कतरे को,
जो ना सराबोर हो भ्रस्टाचार के सैलाब से ।

ढक सको तो ढक्लो अपनी आँखें तुम बेबस हो ,
और कर भी क्या सकते हो जब तुम्हारी माँ की इज्ज़त लुट चुकी ।

क्या भला उस वोट का जो नोट से पराजित हुई ,
लगता है अब तो दिल पर हुई चोट में भी खोट है ।

बीत गये सोने के दिन अब तो पीतल के भी मांदे हैं,
परकटी चिड़िया भी क्या किसी को हसीन मालूम हुई ।

ना कलयुग को कोसो ना ही दोष मढ़ो ज़माने के सर,
जमाना तो वही रहा बस आप और हम बदल गये।

सूरज तो बस ढल गया अब रात का ही साया है ,
फर्क तो बस इतना है की इस रात की सुबह नहीं ।

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